घरेलू हिंसा एवं क़ानूनी प्रावधान

    यत्र नारयस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता 
(जहाँ  नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवताओ का वास होता हैं )
                                                                            .... मनुस्मृति 

इस लेख की शुरुआत के पहले मैं एक घटना बताना चाहता हूँ, यह घटना एक परिचित न्यायाधीश महोदया के साथ हुई , न्यायाधीश महोदया न्यायालय की ओर जा रही थी तभी उनके घर के बाहर लगभग 25 वर्षीय एक महिला अपने साथ तीन बच्चो को गोद में लिए आई और कुछ खाना मांगने लगी, उस महिला के सामने के दांत टूटे हुए थे, तब न्यायाधीश महोदया ने उस महिला से कौतूहलवश तुम गुटखा खाती  हो? तब उस महिला ने बताया नहीं मैडम मैं गुटखा नहीं खाती यह दांत तो मेरे पति ने मुझसे शराब पीकर  मारपीट की थी उससे टूट गए तब उन्होंने उससे पूछा तुमने पुलिस को शिकायत क्यों नहीं की? उस महिला ने जो कहा, उसे सुनकर न्यायाधीश महोदया दंग रह गयी उसने कहा मैडम कोई पुलिस वाला शिकायत दर्ज नहीं करता और उल्टा हमे ही डांटकर भगा देते है और फिर अगर आदमी जेल चला गया तो इन बच्चो को मै अकेले नहीं पाल सकती यह सुन न्यायाधीश महोदया ने उसे खाने को दिया और वह महिला वहाँ से चली गयी परन्तु इस घटना ने जज साहिबा को वास्तविकता से परिचित करा दिया।
इस घटना ने मुझे यह लेख लिखने के लिए प्रेरित किया, इस लेख के जरिये मैं घरेलू हिंसा सम्बंधित सभी विधिक   पहलुओं को रेखांकित करने की कोशिश करूँगा।  
भारत में महिलाओं की परिस्थितियो को ध्यान में रखते हुए संविधान के अनुच्छेद 15 (3) के अंतर्गत महिलाओ के लिए विशेष विधि बनाने की व्यवस्था की गयी है।  भारतीय महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाने हेतु हमारी संसद द्वारा वर्ष 2005 मे  घरेलू हिंसा से महिलाओ का संरक्षण अधिनियम, 2005 पारित किया। 

घरेलू हिंसा क्या है ?   


घरेलू हिंसा से महिलाओ का संरक्षण अधिनियम 2 0 0 5  की धारा 3 में घरेलू हिंसा की एक व्यापक परिभाषा दी गयी हैं, जिसमे निम्नलिखित कृत्य  घरेलू हिंसा की श्रेणी में आते है-      

महिला को शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाना जैसे मारपीट करना , स्वास्थ्य को हानि पहुँचाना, हमला करना, बल प्रयोग करना आदि सम्मिलित है। 

यौन उत्पीड़न करना जैसे ऐसा कोई भी कार्य जो महिला की गरिमा का उलंघन करता हैं। 

मौखिक और भावनात्मक उत्पीड़न जैसे अपमान करना, हंसी उड़ाना, संतान या लड़का ना होने के बारे में अपमानित करना या लगातार उस महिला से जुड़े किसी व्यक्ति को शारीरिक दर्द पहुंचाने की धमकी देना। 

आर्थिक उत्पीड़न जैसे किसी भी वित्त व्यवस्था से महिला को  दूर रखना जिसकी वह हकदार हो , बिना महिला की सम्मति के उसके द्वारा उपयोग में लाई  जाने वाले किसी भी घरेलू सम्पति (जिसमे स्त्रीधन सम्मिलित है) को बेच देना या गिरवी रख देना, महिला को किन्ही सुविधाओं से वंचित कर देना, जिसकी वह हकदार है।  

किसी दहेज या सम्पति की मांग करने के लिए मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित करना एवं उपरोक्त किसी भी कृत्य के द्वारा महिला से जुड़े किसी भी व्यक्ति को धमकाना भी घरेलू हिंसा की श्रेणी में आता है। 

क्या घरेलू हिंसा सिर्फ शादीशुदा महिला के खिलाफ ही मानी जाती है ?


नहीं , अधिनियम के अंतर्गत व्यथित व्यक्ति का अर्थ कोई भी ऐसी स्त्री से है, जो प्रत्यर्थी से घरेलू नाता रखती हो।  जिसका अर्थ है की कोई भी महिला चाहे वह बेटी, पत्नी, बहन, दादी, नानी, बहू आदि किसी भी प्रकार की रिश्तेदारी में हो वह घरेलू हिंसा की शिकायत कर सकती है। यहाँ तक की लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाए भी घरेलू हिंसा की शिकायत कर सकती है। 

क्या घरेलू हिंसा की शिकायत सिर्फ पुरुषो के खिलाफ ही हो सकती है ?

 
सामान्यतः  घरेलू हिंसा की शिकायत किसी वयस्क पुरुष के खिलाफ ही की जा सकती है।  परन्तु शादीशुदा महिला या शादी की प्रकृति के रूप में रह रही  महिला, जैसे  लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला,  पति और उसके किसी भी रिश्तेदार के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा सकती है। जिस व्यक्ति के खिलाफ शिकायत की जाती है उसे प्रत्यर्थी कहते है। 

घरेलू हिंसा होने पर कहाँ शिकायत की जा सकती है?


घरेलू हिंसा की शिकायत पुलिस अधिकारी, नामित संरक्षा अधिकारी अथवा सीधा न्याययिक मजिस्ट्रेट से भी की जा सकती है। यह जरूरी नहीं है की सिर्फ पीड़ित महिला ही शिकायत करे इसे कोई भी रिश्तेदार, NGO , सामाजिक संस्था अथवा पड़ोसी आदि दर्ज करा सकते है। घरेलू हिंसा की शिकायत करने क लिए घरेलू हिंसा का होना भी आवश्यक नहीं है, घरेलू हिंसा होने की आशंका होने पर भी शिकायत की जा सकती है। 

घरेलू हिंसा होने पर किस प्रकार के आदेश न्यायालय द्वारा प्राप्त किये जा सकते है?


संरक्षा आदेश : (PROTECTION ORDER)

इस आदेश के अंतर्गत प्रत्यर्थी को किसी भी प्रकार के उत्पीड़न के कृत्य करने, उत्पीड़न में मदद करने से रोका जा सकता है।  इस आदेश के जरिये प्रत्यर्थी को पीड़ित महिला से किसी भी प्रकार से मिलने एवं सम्पर्क करने से भी रोका जा सकता है।  इस आदेश के जरिये प्रत्यर्थी को पीड़ित महिला की किसी भी सम्पत्ति  से फेरफार करने  से  भी रोका जा सकता है।  इस आदेश के द्वारा पीड़ित महिला से संबंधित किसी भी व्यक्ति के खिलाफ हिंसा करने से प्रत्यर्थी को रोका जा सकता है। (धारा 18) 


निवास आदेश : (RESIDENCE ORDER)

इस आदेश के जरिये प्रत्यर्थी को पीड़ित को घर से बाहर निकालने से रोका जाता हैं , इसके अलावा पीड़ित को उचित रहने की व्यवस्था कराने का आदेश भी न्यायालय के द्वारा दिया जा सकता है। प्रत्यर्थी को इस आदेश द्वारा  किसी भी गृह संपत्ति (जिसमे पीड़ित निवासरत है) को बेचने या गिरवी रखने से रोका जा सकता है। न्यायालय द्वारा इस आदेश के जरिये प्रत्यर्थी को पीड़ित के कमरे तक जाने से भी रोका जा सकता है। (धारा 19 )

मौद्रिक अनुतोष के लिए आदेश : (MONETARY RELIEF)

इस आदेश के अंतर्गत पीड़ित महिला आजीविका की हानि, चिकित्सा के लिए खर्च, उसकी सम्पत्ति को हुए  नुकसान के लिए अनुतोष एवं स्वयं और बच्चो की देखभाल के  लिए हर्जाने की मांग कर सकती है। (धारा 20)

अभिरक्षा आदेश : (CUSTODY ORDER)

इस आदेश के जरिये पीड़ित अथवा उसके रिश्तेदार को प्रत्यर्थी एवं पीड़ित के बच्चो की अभिरक्षा (CUSTODY)  का आदेश दिया जा सकता है। इस आदेश में प्रत्यर्थी को बच्चो से मिलने की छूट भी दी जा सकती है। (धारा 21)

प्रतिकर आदेश : (COMPENSATORY ORDER)

इस आदेश के अंतर्गत पीड़ित महिला को मानसिक प्रताड़ना एवं भावनात्मक कष्ट के लिए प्रतिकर (COMPENSATION) दिलाया जा सकता है। (धारा 22)

अन्य अनुतोष : (OTHER RELIEF)

  
इन् सभी आदेशों के अतिरिक्त पीड़ित महिला यदि पत्नी, अविवाहित पुत्री या माता है (जो स्वयं का पोषण नहीं कर सकती) तो वह क्रमशः अपने पति, पिता या बेटे से धारा 125 दण्ड प्रक्रिया संहिता,1973  के अंतर्गत गुजारे भत्ते  की मांग कर सकती है।        
 
यदि विवाहित महिला के साथ उसके पति या पति के रिश्तेदार के द्वारा क्रूरता की जा रही है तो पीड़ित अथवा पीड़ित के किसी भी रिश्तेदार द्वारा पुलिस को रिपोर्ट या न्याययिक मजिस्ट्रेट को परिवाद (COMPLAINT) दाखिल कर आपराधिक मामला दर्ज किया जा सकता  है। (धारा 498-क  भारतीय दंड संहिता,1860) 

क्या घरेलू हिंसा कानून का दुरपयोग  हो रहा है?

हाँ , कई मामलो में देखा जाता है कि विवाहित महिलाएँ पति एवं उसके रिश्तेदारों को द्वेषपूर्वक झूठा फंसा देती है जिसका संज्ञान माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भी लिया जा चुका है एवं इस सम्बन्ध में विभिन्न दिशा निर्देश भी जारी किये गए है जिसके जरिये यह सुनिश्चित हो सके कि इस कानून का दुरपयोग ना हो सके। (राजेश कुमार एवं अन्य वि. उत्तर प्रदेश राज्य 2017 SCC OnLine SC 821 ; अरणेष कुमार वि. बिहार राज्य 2014 8 SCC 273)

उपसंहारात्मक टिप्पणी 

घरेलू हिंसा के बहुत से कारण होते है जैसे पितृस्त्रात्मक समाज, महिलाओ का अशिक्षित होना एवं महिलाओ का आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर ना होना आदि। इन सभी सुधारो के लिए लगातार प्रयास किये जा रहे है एवं कई प्रयास किये जाना बाकी है।  घरेलू हिंसा की शिकार मुख्यतः पत्नी/बहू होती है, ऐसे मामलो में व्यवस्था के सामने दो चीजों का संतुलन बनाने की चुनौती होती है एक और जहां महिलाओ के अधिकार की रक्षा करनी होती है वही दूसरी और शादी के बंधन को भी बचाना होता है। ऐसी स्थिति में मौजूदा कानून में मेरे अनुसार एक संशोधन किया जा सकता है। जहाँ भी घरेलू हिंसा की शिकायत हो (गंभीर मामलो को छोड़कर) वहाँ सबसे पहले प्रत्यर्थी के विरुद्ध बांड ओवर की कार्यवाही (धारा 107/ धारा 109 दण्ड प्रक्रिया संहिता की तरह) संरक्षा अधिकारी द्वारा ही अनिवार्य रूप से की जावे जिससे की पीड़ित का मामला संज्ञान में भी लाया जा सके और विवाह के बंधन को भी बचाया जा सके।  इसके अतिरिक्त घरेलू हिंसा से पीड़ित महिला के उपचार के लिए अनिवार्य रूप से सभी अस्पतालों को बाध्य किया जा सकता हैं जैसा कि रेप के मामलो में धारा 357-ग दण्ड प्रक्रिया संहिता,1973 के अंतर्गत किया गया है। धारा 166-क भारतीय दण्ड संहिता,1860 में बदलाव कर गंभीर घरेलू हिंसा के मामलो में पुलिस अधिकारी को रिपोर्ट दर्ज करने के लिए बाध्य किया जा सकता है।                       

 (BY NILESH MULATKAR) 
 
    

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